तू मृत्यु सी दृढ है, और चंचल पावन मन सी
तू नवजात सी सरल है, है संकर नव-यौवन सी
तू तेज वेग है झरने सी, कभी मंथर-मन्द है कुर्म सी
तू धीरशील है बगुले सी, है व्यग्र कभी पतंग सी
तू तप्त कभी है नक्षर सी, तो शीतल सोम आँच सी
तू मिष्ठ अगर है ईंख सी, भी कष्ठ-कटु है साँच सी
तू खिलखिलाती गुड़िया है, या तेल रगड़ती अम्मा सी
तू मिसमिसाती बहना है, या नज़र चुराती प्रेमा सी
तू है स्वयं त्यागी शैलपुत्री, या चंडी चन्द्रहघण्टा सी
तू है विलीन-मुक्त ब्रह्मचारिणी, उल्लसित ख़ुश्मंडा सी
तू उदार है स्कंदमाता सी, व कोपाकुल कालरात्रि सी
है मन-मोहिनी कात्यायनी सी,या ललित महागौरी सी
तू नौ रूपी है या सौ रूपी है, या ब्रह्म निरूप भी तेरे रूप सी
या कण कण है तू सृष्टि का, तू ही ब्रह्माण का स्वरूप भी
- पीयूष आसवानी
तू नवजात सी सरल है, है संकर नव-यौवन सी
तू तेज वेग है झरने सी, कभी मंथर-मन्द है कुर्म सी
तू धीरशील है बगुले सी, है व्यग्र कभी पतंग सी
तू तप्त कभी है नक्षर सी, तो शीतल सोम आँच सी
तू मिष्ठ अगर है ईंख सी, भी कष्ठ-कटु है साँच सी
तू खिलखिलाती गुड़िया है, या तेल रगड़ती अम्मा सी
तू मिसमिसाती बहना है, या नज़र चुराती प्रेमा सी
तू है स्वयं त्यागी शैलपुत्री, या चंडी चन्द्रहघण्टा सी
तू है विलीन-मुक्त ब्रह्मचारिणी, उल्लसित ख़ुश्मंडा सी
तू उदार है स्कंदमाता सी, व कोपाकुल कालरात्रि सी
है मन-मोहिनी कात्यायनी सी,या ललित महागौरी सी
तू नौ रूपी है या सौ रूपी है, या ब्रह्म निरूप भी तेरे रूप सी
या कण कण है तू सृष्टि का, तू ही ब्रह्माण का स्वरूप भी
- पीयूष आसवानी